रमजान और मासुम बच्चों का रोजा Ramadan and the fasting of innocent children
प्रतीकात्मक चित्र रमजान के रोजे अल्लाह पाक ने उस हर शख्स याने व्यक्ती पर फर्ज किया है, जिसने कलमा तय्यबा पढा हो| और एक अल्लाह होने कि गवाही दि हो, याने एकेश्वर पर विश्वास किया है| रमजान के रोजे फ़र्ज है, इसलिये रोजे नही रखने कि इजाजत किसी भी शख्स को नही| याने फ़र्ज रोजे कि माफी नही| अलबत्ता जो भी व्यक्ती बिमार है, या फ़िर उस व्यक्ती में रोजा रखने कि जीसमानी याने शारीरिक शक्ती ना हो तो या फ़िर कोई शरई उजर हो तो अलग बात है| मासुम बच्चों का रोजा रोजा फर्ज नही होने बावजुद भी मुस्लिम समुदाय के मासुम बच्चों में रोजा रखने कि गजब कि चाहत दिखाई देती है| यह उन मासुम और नन्हे बच्चों के उपर किया गया संस्कार कहे, या फ़िर उनका शौख| रोजा रखने कि जिद्द और दिल से शौख के कारन मासुम और नन्हे बच्चे अपने जिंदगी का पहला रोजा रखते है| मासुम बच्चे जब रोजा रखने कि इच्छा अपने घर के बडे जिम्मेदार या फ़िर माता-पिता के सामने जताते है तो| बच्चों के मां-बाप उन नन्हे बच्चों को सहर का खाना खा...